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चींटियों की फ़ौज ने किया नदी पार



अफ्रीका महाद्वीप केवल हाथी, शेरों और गैंडो के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि अपनी समझदार और मेहनती चीटियों के लिए भी मशहूर हैं जो इस महाद्वीप के रेगिस्तानी इलाके पर राज्य करती हैं।

मैं अपने कैम्प से घूमता हुआ काफ़ी दूर आया था और अब एक छोटी-सी नदी के किनारे 

लेटा हुआ प्राकृतिक सौन्दर्य का मज़ा ले रहा था। वह बहुत ही छोटी नदी थी और उसकी वाट मुश्किल से ढाई मीटर चौड़ा था। लेटे-लेटे मेरे कानों में ऐसी आवाज़ आई, जो उस समय पैदा होती है, जब किसी कालीन पर रेशम की चादर बिछाई  जाती है। यह आवाज़ सुनकर मैं चौक गया और सोचने लगा

कि अभी एक सुन्दर परी मेरे सामने आएगी जिसका गाउन

उसके पीछे ज़मीन पर लाइनें खींच रहा होगा। लेकिन मेरा विचार ग़लत साबित हुआ और मुझे भूरे और काले रंग की साटन की एक बड़ी-सी चादर नज़र आई जो सूर्य के प्रकाश में चमक रही थी। यह चादर लगभग तीन मीटर चौड़ी और पचास मीटर लम्बी थी। जब मैंने ध्यान से देखा तो मालूम हुआ कि अफ्रीका कि बादशाह चींटियों की फ़ौज थी, जो बहुत तेज़ी से मेरी ओर बढ़ रही थी।

चूंकि अफ्रीका कि चीटियों के खतरनाक हमलों के बारे में मैंने बहुत कुछ पढ़ा था और ख़ुद अपना अनुभव भी था, इसलिए मैं तुरंत अपनी जान बचाने के लिए  उनके सामने से हट कर एक पेड़ पर चढ़ गया। जहाँ से उनकी गतिविधि बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी। चीटियाँ बहुत ही नियोजित ढंग से नाक की सीध में,

 नदी की ओर बढ़ रही थीं। मैंने सोचा नदी किनारे पहुँचकर उन्हें बहुत निराशा होगी और उन्हें वापस लौटना पड़ा 



लेकिन मेरा यह विचार भी इतना ग़लत साबित हुआ कि मैं हैरत से आँखें फाड़े अपनी जगह बैठा रहा। अचानक चीटियों की यह फ़ौज रुक गई। सारी चीटियाँ एक साथ इस तरह की जैसे वह किसी रहस्यपूर्ण और हम इंसानों को न सुनाई देने वाले आदेश को सुनकर रुक गई हा अब उन्होंने परिस्थिति का अवलोकन करना शुरू किया।

 फिर सामने की कतार से कुछ चोटियाँ नियोजित ढंग से आगे बढ़ गई और कुछ चीटियों ने अपना रुख बदल दिया और अपना मुँह पीछे की कतार की ओर कर लिया।

लेकिन यह सब बिल्कुल नियोजित ढंग से हुआ और उन्नति लाइनों में कोई टूट-फूट न होने दी और फिर हर पहले दस्ते  की लगभग दो सौ चीटियाँ तेजी से आगे बढ़ी और नदी किनारे पहुँचकर कुछ ढूंढने  लगीं जल्दी ही उन्हें वह चीज  मिल गई जिसकी उन्हें तलाश थी। 

                          धागे की तरह नदी के इस  किनारे से उस किनारे तक उगी हुई घास  थी, जिसके ऊपरी सिर एक दूसरे बिल्कुल मिले हुए थे। फिर तुरंत करीब-सौ  चीटियाँ, हर पहले दस्ते से आगे बढ़ी और इस पास की नोकों पर इस तरह चढ़ गई कि उनका सिर तो घास के सिरे पर थी और सारा धड़ पानी में डूबा हुआ था।

दरअसल इसी जगह उनको पुल बनाना था और उन्होंने उस पुल के लिए नींव रख दी थी। दूसरी एक सौ चींटियाँ अपनी साथी चींटियों से गूंथ गई और फिर बहुत-सी चींटियाँ लाइनों में आकर उसी तरह एक-दूसरे से गुँथती  चली गई। 

देखते ही देखते चींटियों की एक जंजीर बन गई जो एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँच गई और फिर एक घंटे में यह जंजीर सवा मीटर चौड़ी हो गई। यह जंजीर जितनी चौड़ी होती जा रही थी, चींटियों की पकड़ मज़बूत होती जा रही थी।

नदी के बहाव से घास के हिलने के साथ ही चींटियों भी हिल जाती थीं, लेकिन एक चींटी पर दूसरी चींटी की पकड़ ढीली नहीं हो रही थी बल्कि और मज़बूत होती जा रही थी। अंत में चींटियों का एक मज़बूत पुल तैयार हो गया और चीटियों की पूरी फौज, जो लाइन में खड़ी पुल बनने का इंतज़ार कर रही थी, 

उस पुल पर से गुजरने लगी अब इनकी कतारें टूटने लगी थी, क्योंकि चींटियाँ जल्दी पार पहुँचने के लिए एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थीं। इस जल्दी में कुछ चीटियाँ पानी में भी गिर गई, लेकिन उनकी साथियों ने उनकी सहायता कि और अपनी सींगों की सहायता से उन्हें बचाना शुरू किया और बहुत-सी चीटियाँ बची ली गई और कुछ लहरों से लड़ती हुई बह गई।

कुछ देर बाद चीटियों की फ़ौज का आखिरी रास्ता भी पार पहुँच गया लेकिन अब मुझे यह देखकर हैरत हो रही थी कि जैसे ही आखिरी सिपाही ने पुल पार किया वैसे ही जिस किनारे पर मैं थी, उधर की चींटियों  ने जैसे किसी रहस्यपूर्ण आदेश से अपनी पकड़ ढीली  कर दी और देखते ही देखते पुल बिखर गया।

 हजारों चीटियाँ नदी में डूब गई लेकिन उन्होंने अपनी फ़ौज को आगे बढ़ाने के लिए उसी तरह अपने फ़र्ज  का पालन किया, जैसे किसी नियोजित फ़ौज का हर पहला दस्ता, आगे बढ़ने का रास्ता साफ़ करने के लिए अपने कर्तव्य का पालन करता है।


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