बुद्धिमान साधू की कहानी

पुराने ज़माने की कहानियों से बहुत कुछ ज्ञान की बाते भी रहती थी।  जो की हमारे स्कूल शिक्षा से पूरी नहीं होती। किताब के ज्ञान के साथ - साथ दुनियादारी का भी ज्ञान होना बहुत जरुरी है।
अपने बच्चो को ये सब कहानियाँ जरूर पढ़ के सुनाये "रोचक कहानियाँ " 



बहुत समय पहले की बात है एक राजा हुआ करता था। उसको अपनी दौलत का बहुत ही घमंड था वह खुद को दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति मानता था और जहाँ देखो अपनी दौलत कि शान बताता रहता था यह बात एक साधू को पता चली तो साधु ने राजा की परीक्षा लेने की सोची


साधु ने एक योजना बनाई और राजा के पास पहुंच गया राजा अपनी ऐश और आराम की ज़िंदगी मैं व्यस्त था राजा के सिपाहियों ने राजा को बताया की महाराज द्वार पर एक साधु आया है ,


राजा  ने सिपाहियों से कहा की जाओ  उस साधु को मेरे पास ले आओ सिपाहियों ने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए साधु को राजा के दरबार में ले आये


राजा मुस्कुराते हुए साधु से कहता है की बोलो तुम्हें क्या चाहिए आज मेरा मन बहुत ही प्रसन्न है तुम्हे  जो चाहिये बस कह दो मैं तुम्हें इतना दान कर दूंगा की तुम्हारी पीढ़ियों को कभी भिक्षा मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी पर साधू ने कुछ नहीं माँगा राजा को क्रोध आने लगा


साधु राजा के दरबार मैं इधर उधर नज़र फेर के देखने लगा तो उसे दिखा की राजा के २ मंत्री साथ मैं बैठ कर शतरंज का खेल खेल रहे थे यह देख कर साधू के दिमाग मैं एक योजना आयी उसने राजा से कहा की हे राजन तुम मुझे कुछ दान करना हि चाहते हो तोह मेरी एक इक्छा है की तुम मुझे कुछ   चावल के दाने दान कर दो


राजा ने कहा बोलो तुम्हें कितने चावल के दाने चाहिए तुम्हें


तो साधू ने शतरंज खेलते हुए मंत्रियो की तरफ इशारा करते हुए कहा की इस शतरंज के खेल मैं जितने खाने बने हुए हैं मुझे बस उतना ही चावल चाहिए।


राजा हसते हुए कहता है मुर्ख साधू तुम दुनिया के सबसे अमीर राजा के सामने खड़े हो तुम जो भी मांगोगे मैं देने को तैयार हु। और तुम एक शतरंज के खेल के 64 खाने के बराबर चवाल के दाने मांग रहे हो तुम्हारी मती  ख़राब हो गयी है क्या मुर्ख


साधू ने कहा: मुझे बस उतना ही चाहिये महाराज पर मेरी एक शर्त है


राजा ने कहा क्या शर्त है बताओ


तो साधू ने कहा की आप मुझे पहले खाने मैं एक चावल का दाना दीजिये और अगले खाने मैं पहले खाने से दो गुना चावल के दाने रखियेगा


राजा ठहाके से हस्ते हुए बोला : लगता है की तुम पूरी तरह से अपना दिमागी संतुलन खो चुके हो मैं तुम्हें इतनी धन सम्पत्ती  देने को तैयार हु और तुम हो की शतरंज के 64 खाने मैं अटके हुए हो चलो तुम्हारी जैसी इक्छा


राजा ने अपने सैनिको को बुलाया और आदेश दिया की इस साधू को शतरंज के 64 खाने मैं प्रत्येक खाने मैं पिछले खाने से दो गुना करके चावल के दाने दे दिए जाएँ


राजा इतना कह कर अपने विश्राम कक्ष मैं चला गया


यहाँ साधु को चावल दान देने के लिए सैनिको ने तैयारी कर ली


शतरंज खेलने वाला ६४ खाने का तख्ता रखा गया पहले खाने मैं चावल का 1 दाना आया दूसरे खाने मैं 2 चावल के दाने इसी प्रकार तीसरे मैं पिछले खाने से दो गुना ज्यादा दाने अर्थात 4 दाने और अगले मैं 8 फिर अगले मैं 16 फिर अगले मैं 32 फिर 64 फिर 128 फिर 256 फिर  512  फिर 1024 फिर 2048 फिर 4096 इस तरह से चावल के दाने बढ़ते बढ़ते चौबीसवें खाने मैं 8388608 चावल के दाने रखने पढ़ रहे थे।
 और राजा का आदेश पूरा करने के लिए सैनिको को समस्या आने लगी सारे सैनिक परेशान हो कर राजा के पास पहुंच गए सैनिको ने राजा से कहा महाराज राज महल का  सारा अनाज ख़त्म हो गया है।  और अभी साधु के मांगे हुए दान का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं हो पाया है।


राजा ने साधू को दिए हुए दान को पूरा करने के लिए  अपने सभी राज्य से अनाज मंगवाना शुरू कर दिया देखते ही देखते 3  4 खाने मैं अनाज भरने के बाद राजा के सभी राज्य का अनाज  ख़त्म हो गे गया फिर राजा ने अपनी सारी दौलत के बदले दूसरे राजाओ से उनके राज्य का अनाज भी मंगवा लिया


लेकिन फिर भी राजा उस साधू की मांगी हुई छोटी सी भिक्षा की पूर्ति नहीं कर पाया फिर साधु ने राजा से कहा की मुझे तुम्हारा ये दौलत का घमंड तोडना था इसी लिए मैंने अपने तर्क से तुमसे इस प्रकार का दान माँगा


शतरंज के 64 खानों के बराबर अनाज तो पूरी पृथ्वी में  नहीं होगा तो तुम कैसे मुझे दे पाओगे??😌😌





तो ये कहानी यही ख़त्म होती  है उम्मीद करता हूँ आपको ये कहानी पसंद  आयी होगी


कमेंट करके जरूर बताईये मुझे ख़ुशी होगी


जाते जाते एक प्रश्न करना चाहूंगा


आखिर 64 खानो मैं कितने दाने आएंगे ?

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