बुधवार, 5 अगस्त 2020

ख्वाहिशों का आदी दिल






कभी आँसू तो कभी खुशी देखी,
हमने अक्सर मजबूरी और बेबसी देखी;
उनकी नाराजगी को हम क्या समझें,
हमने खुद की तकदीर की बेबसी देखी

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ;
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की!


प्यार कर के कोई जताए ये ज़रूरी तो नहीं,
याद कर के कोई बताये ये ज़रूरी तो नहीं;
रोने वाले तो दिल में ही रो लेते हैं अपने,
कभी आँख में आँसू आये ये ज़रूरी तो नहीं!


तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं;
सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं!


ये अलग बात है कि दिखाई ना दे, पर शामिल जरूर होता है;
खुदकुशी करने वाले का भी, कोई ना कोई कातिल जरूर होता है!





मैं तनहा था, मैं तनहा हूँ, तुम आओ तो क्या, न आओ तो क्या;
जब देखने वाला कोई नहीं, बुझ जाओ तो क्या, जल जाओ तो क्या!


एक पल में जो आकर गुजर जाये,
ये हवा का वो झोका है और कुछ नहीं,
प्यार कहती है दुनिया जिसे,
एक रंगीन धोखा है और कुछ नहीं!


रौशनी में कुछ कमी रह गई हो तो बता देना;
ऐ सनम दिल आज भी हाजिर है जलने को!


पूछा न जिंदगी में किसी ने भी दिल का हाल;
अब शहर भर में ज़िक्र मेरी खुदकुशी का है।



ये अलग बात है के दिखाई ना दे, पर शामिल ज़रूर होता है;
खुदकुशी करने वाले का भी, कोई ना कोई क़ातिल ज़रूर होता है!


दफ़न से पहले नब्ज़ जाँच लेना साहेब;
कलाकार उम्दा है, कहीं किरदार में ना हो!


सुना है उस को मोहब्बत दुआएँ देती है;
जो दिल पे चोट तो खाए मगर गिला न करे!


मैं उम्र भर जिनका न कोई दे सका जवाब;
वह इक नजर में, इतने सवालात कर गये!





हमारे सब्र का इम्तिहान न लीजिये,
हमारे दिल को यूँ सजा न दीजिये,
जो आपके बिना जी न सके एक पल,
उन्हें और जीने की दुआ न दीजिये!


मंजिल मिले न मिले, ये तो मुकद्दर की बात है;
हम कोशिश ही न करे ये तो गलत बात है!


ख़्वाब, उम्मीद, तमन्नाएँ, तअल्लुक़, रिश्ते;
जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे!


नजरें मिला कर किया दिल को ज़ख़्मी,
अदाएं दिखा कर सितम ढहा रहे हो;
वफाओं का मेरी खूब सिला दिया है,
तड़पता हुआ छोड़ कर जा रहे हो!


ना कोई उस से भाग सके और ना कोई उस को पाए;
आप ही घाव लगाए समय और आप ही भरने आए!


भीगी मिट्टी की महक प्यास बढ़ा देती है;
दर्द बरसात की बूँदों में बसा करता है!


ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने;
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला!

चल हो गया फैंसला कुछ कहना ही नहीं;
तू जी ले मेरे बगैर मुझे जीना ही नहीं!




कभी टूट कर बिखरो तो मेरे पास आ जाना,
मुझे अपने जैसे लोग बहुत पसंद हैं!


अब क्या बताये किसी को कि ये क्या सजा है;
इस बेनाम ख़ामोशी की क्या वजह है!


दुःख तो अपने ही देते हैं,
वरना गैरों को कैसे पता कि हमें तकलीफ किस बात से होती है!

छोड़ो ना यार, क्या रखा है सुनने और सुनाने में;
किसी ने कसर नहीं छोड़ी दिल दुखाने में!

रोज़ पिलाता हूँ एक ज़हर का प्याला उसे;
एक दर्द जो दिल में है मरता ही नहीं है!


तू साथ होकर भी साथ नहीं होती;
अब तो राहत में भी राहत नहीं होती!


ज़िन्दगी ने मेरे दर्द का क्या खूब इलाज सुझाया;
वक़्त को दवा बताया, ख्वाहिशों से परहेज़ बताया!

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,
मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग।


सारी दुनिया के गम हमारे हैं;
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं!


क़त्ल तो लाजिम है इस बेवफा शहर में;
जिसे देखो दिल में नफरत लिये फिरता है।


इक टूटी-सी ज़िंदगी को समेटने की चाहत थी;
न खबर थी उन टुकड़ों को ही बिखेर बैठेंगे हम।


खता हो गयी तो फिर सज़ा सुना दो,
दिल में इतना दर्द क्यों है वजह बता दो;
देर हो गयी याद करने में जरूर,
लेकिन तुमको भुला देंगे ये ख्याल मिटा दो।


सुना है उस को मोहब्बत दुआएँ देती हैं;
जो दिल पे चोट तो खाए मगर गिला न करे।


पांवोंं के लड़खड़ाने पे तो सबकी है नज़र;
सर पे कितना बोझ है कोई देखता नहीं।


भीड़ में भी तन्हा रहना मुझको सिखा दिया,
तेरी मोहब्बत ने दुनिया को झूठा कहना सिखा दिया;
किसी दर्द या ख़ुशी का एहसास नहीं है अब तो,
सब कुछ ज़िन्दगी ने चुप-चाप सहना सिखा दिया।


क्यों बयान करूँ अपने दर्द को?
यहाँ सुनने वाले बहुत हैं, पर समझने वाला कोई नहीं!


हारा हुआ सा लगता है वजूद मेरा;
हर एक ने लूटा है दिल का वास्ता देकर!



धड़कन बनके जो दिल में समा गए हैं, हर एक पल उनकी याद में बिताते हैं;
आँसू निकल आये जब वो याद आ गए, जान निकल जाती है जब वो रूठ जाते हैं।

खामोशियाँ कर देतीं बयान तो अलग बात है;
कुछ दर्द हैं जो लफ़्ज़ों में उतारे नहीं जाते!





दर्द बनकर ही रह जाओ हमारे साथ
सुना है दर्द बहुत देर तक साथ रहता है!


ख्वाहिशों का आदी दिल काश ये समझ सकता;
कि साँस टूट जाती है इक आस टूट जाने से!

काँच के दिल थे जिनके उनके दिल टूट गए
हमारा दिल था मोम का पिघलता ही चला गया!


शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

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गुरुवार, 30 जुलाई 2020

"60 गांव बकरी ने चरे" पुरानी  कहावत का खुलासा
पुराने ज़माने की कहानियों से बहुत कुछ ज्ञान की बाते भी रहती थी।  जो की हमारे स्कूल शिक्षा से पूरी नहीं होती। किताब के ज्ञान के साथ - साथ दुनियादारी का भी ज्ञान होना बहुत जरुरी है।
अपने बच्चो को ये सब कहानियाँ जरूर पढ़ के सुनाये "रोचक कहानियाँ " 


प्राचीन समय की बात है
        पहले  राजा  शिकार के बहुत  शौकीन हुआ करते थे।  एक बार शिकार खेलने गया। जंगल में जानवर का पीछा करते-करते अपने साथियों से बिछड़ गया।

रात हो गई। भूखा प्यासा राजा किसी तरह एक किसान के दरवाजे पर पहुंचा। किसान राजा को क्या जाने ? किसान ने मेहमान समझकर उसे बैठाया, पानी पिलाया। कुछ देर बाद भोजन बनाकर खिलाया। उसके सोने के लिए बिस्तर लगाया।

राजा किसान से बहुत खुश हुआ। अगले दिन राजा चलने लगा, तो उसने एक पत्ता उठाया।  किसान के नाम 60 गांव लिख दिए। किसान को बताया तो वह फूला ना समाया । राजा अपनी राह चला गया।

किसान की थी एक पालतू बकरी । बकरी वहां आई और झट से उस पत्ते को चबा लिया। किसान जब तक उसे रोकता , पत्ता बकरी के पेट में पहुंच चुका था। अब किसान करे तो क्या करें ? 😞वह किसी तरह रोता कलपता राज महल पहुंचा ।

दरबारी उस गवार को अंदर नहीं आने दे रहे थे । बहुत हाथ पांव जोड़ने पर राजा तक पहुंच पाया। राजा ने देखते ही उसे पहचान लिया। राजा कुछ पूछते तभी
किसान चिल्ला कर बोला -"माई बाप मैं बर्बाद हो गया 60 गांव बकरी ने चबा लिए।"

आसपास के लोग हैरान होकर गांव और किसान को देख रहे थे कि क्या बकता है। लेकिन राजा समझ गया। उसने तांबे के टुकड़े पर खुदवा कर उसे दोबारा आदेश पत्र दिया। किसान को गांव का पक्का मालिक बना दिया।

तब से किसान का बड़ा नुकसान होने पर लोग कहते हैं 60 गांव बकरी ने चर लिए।

झाड़ी में जूता
पुराने ज़माने की कहानियों से बहुत कुछ ज्ञान की बाते भी रहती थी।  जो की हमारे स्कूल शिक्षा से पूरी नहीं होती। किताब के ज्ञान के साथ - साथ दुनियादारी का भी ज्ञान होना बहुत जरुरी है।
अपने बच्चो को ये सब कहानियाँ जरूर पढ़ के सुनाये "रोचक कहानियाँ " 





              बिलासपुर  में हीरे जवाहरात के व्यापार थे।  उनके पोते का जन्मदिन था।

परिवार वालों ने बच्चे का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया सोमनाथ के पोते को हीरे मोती जड़े जूते उपहार में दिए। 

शाम के समय बच्चा अपने पिता के साथ सैर को निकला उसके पांव से एक जूता निकलकर कहीं गिर गया किसी को कुछ पता ना चला।

जूता एक नवयुवक को मिला उसका नाम अजीत था। वह नौकरी की तलाश में जा रहा था।उसने जूता उठाकर देखा तो चकित रह गया सोचा जूता किसी धनवान का है कीमती भी बहुत है इसलिए पहले इसे इसके मालिक तक पहुंचाना होगा।

इसी उधेड़बुन में वह सड़क के किनारे बड़ी देर तक खड़ा रहा तभी वहां से उसका मित्र भूषण गुजर रहा था उसने अजीत से पूछा भाई यहां खड़े खड़े क्या सोच रहे हो

अजीत बोला मुझे यहां एक कीमती जूता पड़ा मिला है।  जिसमें हीरे मोती जड़े मैं चाहता हूं जिसका यह जूता है उसे वापस दे सकूं ।
भूषण ने जूता देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।  उसके मन में लालच आ गया बोला अजीत भाई जिसका यह जूता है।  उसे मैं जानता हूं मैं उसके घर के पास ही जा रहा हूं, तुम जूता मुझे दे दो मैं इसे पहुंचा दूंगा। तुम क्यों परेशान हो निश्चिंत होकर अपने काम पर जाओ।


अजीत ने उस पर विश्वास का जूता उसे दे दिया।  जब भूषण जूता लेकर कुछ दूर चला गया तो अजीत के मन में शंका हुआ कहीं भूषण की नियत बिगड़ गई तो जूता उसके मालिक को नहीं मिलेगा इससे तो मैं भी उसके साथ चला जाता
यह सोचकर वह शीघ्र उस ओर भागा जिधर भूषण गया था दूर उसे भूषण जाता हुआ दिखाई दिया उसने आवाज लगाई भूषण भूषण रुक जाओ मैं भी आ रहा हूं। प्रभु भूषण नहीं रुका उसने अपनी चाल और तेज कर दी वह झाड़ी के बीच जाकर गायब हो गया

काफी खोजने के बाद उसे भूषण दिखाई दिया  उसने देखते ही अजीत बोला तुम कहां चले गए थे।  लाओ जूता मुझे दे दो मैं ही उसे उसके मालिक तक पहुंचाऊंगा
कौन सा जूता तुमने मुझे कब दिया भूषण बोला
ये कैसी  बातें कर रहे हो ! अभी कुछ देर पहले ही तो दोनों में झगड़ा होने लगा भीड़ इकट्ठी हो गई मामला दरोगा तक पहुंचा उसने भूषण की तलाशी ली पर जूता ना मिला दरोगा को विभूषण पर कुछ शक हुआ वह दोनों को राजा के पास ले गया और पूरी बात बताई

राजा ने दोनों से सच बोलने को कहा दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े रहे अंत में राजा ने भूषण को छोड़ दिया वह वहां से चला गया यह देख अजीत को बड़ी निराशा हुई तभी राजा ने कहा तुम कुछ देर यहीं ठहरो

राजा ने अपने कुछ गुप्त चरणों को भूषण के पीछे भेज दिया भूषण इस बात से बेखबर था वह सीधा वही पहुंचा जहां झाड़ियों में उसने जूता छुपाया था जब उसे विश्वास हो गया कि कोई उसका पीछा नहीं कर रहा है तो उसने एक झाड़ी से जूता निकाल दिया फिर घर की ओर चल दिया तभी राजा के गुप्त चारों ने उसे पकड़ लिया और उसे दरबार में लाया गया

अजीत तो पहले से ही दरबार में मौजूद था राजा ने भूषण को कारागार में डलवा दिया जूता अजीत को वापस कर दिया गया तब अजीत ने कहा महाराज मेरे लिए इस बात का पता लगाना कठिन होगा कि इस जूते का असली मालिक कौन है इसलिए इसे आप राजकोष में जमा कर लीजिए जब इसका मालिक मिल जाए तो उसे लौटा दें

राजा अजीत की ईमानदारी पर प्रसन्न हुआ बोला तुम्हारी बात ठीक है मैं घोषणा करवाता हूं और जिसका भी यह जूता है वह ऐसी ही दूसरा जूता ले आए

राजा ने घोषणा करवाई जब सोमनाथ को इसका पता लगा तो वह भागा भागा राजा के पास आया उसने दूसरे पैर का जूता दिखा दिया राजा ने दोनों जूतों को मिलाया तो दोनों एक जैसे ही थे राजा ने अजीत को भी बुलवा लिया

व्यापारी ने अजीत की ईमानदारी पर खुश होकर इनाम देना चाहा लेकिन उसने इंकार कर दिया कहां यह तो मेरा कर्तव्य था मैं तो काम की तलाश में जा रहा था। 😉

व्यापारी ने अपने साथ काम करने के लिए कहा तभी राजा ने कहा अजीत की नौकरी तो लग चुकी है इस बार सब चौंक उठे तब राजा ने कहा अजीत जैसे ईमानदार व्यक्ति की राज्य को ज्यादा आवश्यकता है

फिर राजा ने मंत्री से कहा मंत्री जी अजीत के योग्य नौकरी की व्यवस्था कीजिए राजा के निर्णय पर सभी प्रसन्नता अजीत की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी

बुद्धिमान साधू की कहानी
पुराने ज़माने की कहानियों से बहुत कुछ ज्ञान की बाते भी रहती थी।  जो की हमारे स्कूल शिक्षा से पूरी नहीं होती। किताब के ज्ञान के साथ - साथ दुनियादारी का भी ज्ञान होना बहुत जरुरी है।
अपने बच्चो को ये सब कहानियाँ जरूर पढ़ के सुनाये "रोचक कहानियाँ " 



बहुत समय पहले की बात है एक राजा हुआ करता था। उसको अपनी दौलत का बहुत ही घमंड था वह खुद को दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति मानता था और जहाँ देखो अपनी दौलत कि शान बताता रहता था यह बात एक साधू को पता चली तो साधु ने राजा की परीक्षा लेने की सोची


साधु ने एक योजना बनाई और राजा के पास पहुंच गया राजा अपनी ऐश और आराम की ज़िंदगी मैं व्यस्त था राजा के सिपाहियों ने राजा को बताया की महाराज द्वार पर एक साधु आया है ,


राजा  ने सिपाहियों से कहा की जाओ  उस साधु को मेरे पास ले आओ सिपाहियों ने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए साधु को राजा के दरबार में ले आये


राजा मुस्कुराते हुए साधु से कहता है की बोलो तुम्हें क्या चाहिए आज मेरा मन बहुत ही प्रसन्न है तुम्हे  जो चाहिये बस कह दो मैं तुम्हें इतना दान कर दूंगा की तुम्हारी पीढ़ियों को कभी भिक्षा मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी पर साधू ने कुछ नहीं माँगा राजा को क्रोध आने लगा


साधु राजा के दरबार मैं इधर उधर नज़र फेर के देखने लगा तो उसे दिखा की राजा के २ मंत्री साथ मैं बैठ कर शतरंज का खेल खेल रहे थे यह देख कर साधू के दिमाग मैं एक योजना आयी उसने राजा से कहा की हे राजन तुम मुझे कुछ दान करना हि चाहते हो तोह मेरी एक इक्छा है की तुम मुझे कुछ   चावल के दाने दान कर दो


राजा ने कहा बोलो तुम्हें कितने चावल के दाने चाहिए तुम्हें


तो साधू ने शतरंज खेलते हुए मंत्रियो की तरफ इशारा करते हुए कहा की इस शतरंज के खेल मैं जितने खाने बने हुए हैं मुझे बस उतना ही चावल चाहिए।


राजा हसते हुए कहता है मुर्ख साधू तुम दुनिया के सबसे अमीर राजा के सामने खड़े हो तुम जो भी मांगोगे मैं देने को तैयार हु। और तुम एक शतरंज के खेल के 64 खाने के बराबर चवाल के दाने मांग रहे हो तुम्हारी मती  ख़राब हो गयी है क्या मुर्ख


साधू ने कहा: मुझे बस उतना ही चाहिये महाराज पर मेरी एक शर्त है


राजा ने कहा क्या शर्त है बताओ


तो साधू ने कहा की आप मुझे पहले खाने मैं एक चावल का दाना दीजिये और अगले खाने मैं पहले खाने से दो गुना चावल के दाने रखियेगा


राजा ठहाके से हस्ते हुए बोला : लगता है की तुम पूरी तरह से अपना दिमागी संतुलन खो चुके हो मैं तुम्हें इतनी धन सम्पत्ती  देने को तैयार हु और तुम हो की शतरंज के 64 खाने मैं अटके हुए हो चलो तुम्हारी जैसी इक्छा


राजा ने अपने सैनिको को बुलाया और आदेश दिया की इस साधू को शतरंज के 64 खाने मैं प्रत्येक खाने मैं पिछले खाने से दो गुना करके चावल के दाने दे दिए जाएँ


राजा इतना कह कर अपने विश्राम कक्ष मैं चला गया


यहाँ साधु को चावल दान देने के लिए सैनिको ने तैयारी कर ली


शतरंज खेलने वाला ६४ खाने का तख्ता रखा गया पहले खाने मैं चावल का 1 दाना आया दूसरे खाने मैं 2 चावल के दाने इसी प्रकार तीसरे मैं पिछले खाने से दो गुना ज्यादा दाने अर्थात 4 दाने और अगले मैं 8 फिर अगले मैं 16 फिर अगले मैं 32 फिर 64 फिर 128 फिर 256 फिर  512  फिर 1024 फिर 2048 फिर 4096 इस तरह से चावल के दाने बढ़ते बढ़ते चौबीसवें खाने मैं 8388608 चावल के दाने रखने पढ़ रहे थे।
 और राजा का आदेश पूरा करने के लिए सैनिको को समस्या आने लगी सारे सैनिक परेशान हो कर राजा के पास पहुंच गए सैनिको ने राजा से कहा महाराज राज महल का  सारा अनाज ख़त्म हो गया है।  और अभी साधु के मांगे हुए दान का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं हो पाया है।


राजा ने साधू को दिए हुए दान को पूरा करने के लिए  अपने सभी राज्य से अनाज मंगवाना शुरू कर दिया देखते ही देखते 3  4 खाने मैं अनाज भरने के बाद राजा के सभी राज्य का अनाज  ख़त्म हो गे गया फिर राजा ने अपनी सारी दौलत के बदले दूसरे राजाओ से उनके राज्य का अनाज भी मंगवा लिया


लेकिन फिर भी राजा उस साधू की मांगी हुई छोटी सी भिक्षा की पूर्ति नहीं कर पाया फिर साधु ने राजा से कहा की मुझे तुम्हारा ये दौलत का घमंड तोडना था इसी लिए मैंने अपने तर्क से तुमसे इस प्रकार का दान माँगा


शतरंज के 64 खानों के बराबर अनाज तो पूरी पृथ्वी में  नहीं होगा तो तुम कैसे मुझे दे पाओगे??😌😌





तो ये कहानी यही ख़त्म होती  है उम्मीद करता हूँ आपको ये कहानी पसंद  आयी होगी


कमेंट करके जरूर बताईये मुझे ख़ुशी होगी


जाते जाते एक प्रश्न करना चाहूंगा


आखिर 64 खानो मैं कितने दाने आएंगे ?
  दांतों की परी (परियों की कहानी)

                             




         मिंकी एक 6 साल की लड़की थी! वह अपने बिस्तर पर अपने मां के बाजू से सो रही थी और उसकी मम्मी उसको परियों की कहानी सुना रही थी!  
मिंकी बोलती है मां के सच में परियां होती है? 
उसकी मां बोलती है हाथी पर परियों को सिर्फ अच्छे बच्चे पसंद होते हैं  परी कभी बुरे बच्चों के सामने नहीं आती तो तुम्हें कभी शैतानी नहीं करनी  क्योंकि परियां हमेशा तुम्हें देखती रहती है चलो अब सो जाओ मिंकी
अगले दिन सुबह   मिंकी अपनी बहन पिंकी के साथ टेबल में बैठकर  खिलौनों से खेल रही थी वही उसकी मां बैठी होती है और वह बोलती हैं पिंकी गुड़ियों से खेलना बंद करो और मिंकी जल्दी से अपना एप्पल खा लो 
मिंकी कहती है मुझे भूख नहीं है मां नहीं पीना मुझे 
उसकी मां बोलती है तुम अच्छी बच्ची हो ना जल्दी से  खा लो नहीं तो परिया नहीं आएंगी  
मिंकी बोलती है अगर मैंने यह एप्पल खा लिया तो परियां  आएंगी
मां बोलती है तुम अगर एप्पल खाओ गी नहीं तो कैसे पता चलेगा
मिल्की जल्दी से फल खाना शुरु कर देती और अचानक जोर से रोने लगती है और कहती है देखो मां मेरा दांत टूट गया अब मैं इसे अपने तकिए के नीचे रख दूंगी और फिर दांतों की परी आ जाएगी 
 अपना दांत लेकर अपने कमरे  की ओर भागती है
 मां बोलती है मिंकी जल्दी सो जाना नहीं तो दांतों की परी नहीं आएगी
 मां जैसे ही दरवाजा बंद करती है तो रोशनी की किरण खिड़की से अंदर आती हैं
 मिंकी तकिए के नीचे रखा अपना दांत  देखती है और सो जाती है
 कुछ देर बाद  मिंकी की नींद किसी आवाज के कारण खुल जाती है और वह आंख खोल कर देती है कि उसके सामने एक बहुत सुंदर परी थी जिसमें सफेद रंग की गाउन पहन रखी थी और उसके हाथ में उसकी जादुई छड़ी थी और वह  मिंकी के सामने उड़ रही थी
 मिंकी पूछती है क्या तुम  दांतों की परी हो
 परी कहती है  हां मिंकी मैं ही दांतो की परी हूं तुम एक अच्छी लड़की हो इसीलिए मैं तुम्हारे दांत लेने आई हूं और तुम्हें गिफ्ट देने आई हूं क्या चाहिए  मिंकी तुम्हें 
मिंकी कहती है मुझे परियां बहुत पसंद है क्या तुम मुझे भी एक परी बना सकती हो
 परी कहती है हां बिल्कुल आबरा का डाबरा
 मिंकी एक छोटी परी में बदल जाती है
  मिंकी कहती है वाह धन्यवाद
 दांतों वाली परी कहती है चलो मिंकी हम बादलों में चलते हैं जैसे दूसरी परियां उड़ती हैं
  परी  मिंकी का हाथ पकड़ती है और वह उड़ते उड़ते खिड़की से निकल कर बादलों के पीछे पहुंच जाती हैं उनकी को बहुत मजा आ रहा था और वह हंसे जा रही थी कुछ टाइम बाद वह लोग फिर से घर के अंदर आ जाते
 दांतों की परी कहती है बाय  मिंकी अच्छी बच्ची की तरह रहना तुम
 मिंकी कहती है अब आप वापस कब आओगी
 तो दांत वाली परी कहती है जब तुम्हारे पास  दांत होगा
  मिंकी के दांत टूटते हैं और वह  परी से मिलती है और बादलों की सैर करने जाती है
 एक दिन मिल की टेबल पर बैठकर अपने दांतो को हिला रही थी
 ऐसा करते हुए उसकी मां ने देख लिया तो उसकी मां कहती है नहीं मिंकी ऐसा नहीं करो
 मिंकी कहती है मां मुझसे इंतजार नहीं हो रहा मुझे दांतों की परी से मिलना है
 उसकी मां थोड़ा सा हस्ती है
 मिंकी की  बहन पिंकी का दांत एक दिन टूट जाता है
  पिंकी भी अपना दांत तकिए के नीचे रख देती है लेकिन मिंकी चुपके से उसका दांत अति के नीचे से निकाल लेती है और अपने तकिए के नीचे रख लेती है अचानक वह उठती है और आईने के सामने जाकर देखती है किसके साथ गायब हो चुके यह देखकर वह रोने लगती है  दांतों की परी आ जाती है
 परी कहती है क्या हुआ  मिंकी क्यों रो रही हो
 मिंकी रोते रोते हुए कहती है क्योंकि मेरे सारे दांत गायब हो गए हैं अब सब मेरा मजाक उड़ाएंगे
 तो परी कहती हैं मैंने कहा था तुम कभी शैतानी मत करना तो फिर तुम शैतान बच्ची क्यों बनी यह तुम्हारी सजा है तुमने पिंकी का दांत चुराया है
  मिंकी कहती है मुझे माफ कर दो
 परी पूछती है क्या तुम फिर से ऐसा करोगी
 मिंकी कहती है नहीं नहीं अब मैं ऐसा कभी नहीं करूंगी
 तो दांतों की परी कहती है मुझे तुम पर भरोसा है
 फिर परी अपनी जादुई छड़ी  चलाती हैं और मिंकी के दांत फिर से वापस आ जाते हैं पिंकी भी उठ जाती है और आकर वह परी को गले लगाती है
 परी कहती है बच्चों में तुम्हें परियों की तरह  उड़ाती हूं 
 और तीनों आसमान में उड़ जाते हैं
 आज की कहानी यहीं खत्म होती है अगर आपको अच्छा लगा तो कमेंट करके जरूर बताइए

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

आज का ज्ञान










2 अगस्त को फ्रेंडशिप डे है - लड़के लड़कियों के पीछे!
3 अगस्त को राखी है - लड़कियां लड़कों के पीछे!

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कोरोना अब गली-गली और घर-घर जाकर ढूंढ रहा है कि...
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थाली और ताली किसने बजायी थी?

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नहीं चाहती मैं तुम्हें किसी कीमत पर खोना...
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यही कह कह कर वो लगाती है चूना!

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आज-कल के बच्चों के मार्क्स फॉरेनहाइट में आते हैं 98.2, 98.4, 98.9...
हमारे तो सेंटीग्रेड में आते थे 37.1, 37.4, 37.6!

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मैं बचपन में इतना सुंदर था कि मैडम कहती थी...
वहाँ से उठ, मेरे सामने आ कर बैठ!

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उससे बिछड़ के हम रोये इतना कि उसकी बहन बोली तू मुझे पटा ले...
फिर क्या था हमने आँसू पोछते हुए उसको गले लगा लिया!

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आज का ज्ञान:
इश्क़ की नाव में पहला छेद तब होता है जब महबूबा से खुबसूरत उसकी सहेली होती है!

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आजकल के बच्चे को सब्ज़ी पसंद ना हो तो माँ के पास बहुत ऑप्शन हैं!
बेटा पास्ता बना दूँ, बेटा मैग्गी खाओगे?
एक हमारा समय था, हमारी माँ के पास दो ही ऑप्शन थे!
सब्ज़ी खाओगे या जूते?
और हम दोनों ही खा लेते थे, पहले जूते फिर सब्ज़ी!